भाड़े का टट्टू (कहानी) : मुंशी प्रेमचंद
Bhaade Ka Tattoo (Story) : Munshi Premchand

आगरा कॉलेज के मैदान में संध्या-समय दो युवक हाथ-से-हाथ मिलाए टहल रहे थे। एक का नाम यशवन्त था, दूसरे का रमेश। यशवन्त डील-डौल का ऊंचा और बलिष्ठ था। उसके मुख पर संयम और स्वास्थ्य की कांति झलकती थी। रमेश छोटे कद और इकहरे बदन का, तेजहीन और दुर्बल आदमी था। दोनों में किसी विषय पर बहस हो रही थी।
यशवन्त ने कहा- मैं आत्मा के आगे धन का कुछ मूल्य नहीं समझता।
रमेश बोला- बड़ी खुशी की बात है।
यशवन्त- हां, देख लेना। तुम ताना मार रहे हो, लेकिन मैं दिखला दूंगा कि धन को कितना तुच्छ समझता हूँ।
रमेश- खैर, दिखला देना। मैं तो धन को तुच्छ नहीं समझता। धन के लिए आज 15 वर्षों से किताबें चाट रहा हूँ धन के लिए माँ-बाप, भाई-बहन सबसे अलग यहाँ पड़ा हूँ। न जाने अभी कितनी सलामियाँ देनी पड़ेगी, कितनी खुशामद करनी पड़ेगी। क्या इसमें आत्मा का पतन न होगा? मैं तो इतने ऊँचे आदर्श का पालन नहीं कर सकता। यहाँ तो अगर किसी मुकदमे में अच्छी रिश्वत पा जाएँ तो शायद छोड़ न सके। क्या तुम छोड़ दो
यशवन्त–मैं उसकी ओर आँखें उठाकर भी न देखूँगा और मुझे विश्वास है कि तुम जितने नीच बनते हो, उतने नहीं हो।
रमेश- मैं उससे कहीं नीच हूँ जितना कहता हूँ।
यशवन्त- मुझे तो यकीन नहीं आता कि स्वार्थ के लिए तुम किसी को नुकसान पहुँचा सकोगे।
रमेश- भाई, संसार में आदर्श का निर्वाह केवल संन्यासी ही कर सकता है, मैं तो नहीं कर सकता। मैं तो समझता हूँ कि अगर तुम्हें धक्का देकर तुमसे बाजी जीत सकूँ, तो तुम्हें जरूर गिरा दूँगा। और, बुरा न मानो तो कह दूँ तुम भी मुझे जरूर गिरा दोगे। स्वार्थ का त्याग करना कठिन है।
यशवन्त- तो मैं कहूँगा कि तुम भाड़े के हो।
रमेश- और में कहूंगा कि तुम काठ के उल्लू हो।
यशवन्त और रमेश साथ-साथ स्कूल में दाखिल हुए और साथ-ही-साथ उपाधियाँ लेकर कॉलेज से निकले। यशवन्त कुछ मंदबुद्धि, पर बला का मेहनती था। जिस काम को हाथ में लेता, उससे चिमट जाता उसे पूरा करके ही छोड़ता। रमेश तेज था, पर आलसी। घंटे-भर भी जमकर बैठता उसके लिए मुश्किल था। एम.ए. तक तो वह आगे रहा और यशवन्त पीछे, मेहनत बुद्धिबल से परास्त होती रही, लेकिन सिविल-सर्विस में पासा पलट गया। यशवन्त सब धंधे छोड़कर किताबों पर पिल पड़ा, घूमना-फिरना, सैर-सपाटा, सरकस-थियेटर, यार-दोस्त, सबसे मुँह मोड़कर अपनी एकान्त कुटीर में जा बैठा। रमेश दोस्तों के साथ गप-शप उड़ाता, क्रिकेट खेलता रहा। कभी-कभी मनोरंजन के तौर पर किताबें देख लेता। कदाचित् उसे विश्वास था कि अब की भी मेरी तेजी बाजी ले जाएगी। अकसर जाकर यशवन्त को दिक करता। उसकी किताब बंद कर देता, कहता, क्यों प्राण दे रहे हो? सिविल- सर्विस कोई मुक्ति तो नहीं है, जिसके लिए दुनिया से जाता तोड़ लिया जाए! यहाँ तक कि यशवन्त उसे आते देखता, तो किवाड़ बंद कर देता।
आखिर परीक्षा का दिन आ पहुँचा। यशवन्त ने सब-कुछ याद किया था, पर किसी प्रश्न का उत्तर सोचने लगता, तो उसे मालूम होता, मैंने जितना पढ़ा था, सब भूल गया। वह बहुत घबराया हुआ था। रमेश पहले से कुछ सोचने का आदी न था। सोचता, जब परचा सामने आएगा, उस वक्त देखा जाएगा। वह आत्मविश्वास से फूला-फूला फिरता था।
परीक्षा का फल निकला, तो सुस्त कछुआ तेज खरगोश से बाजी मार ले गया था।
अब रमेश की आँखें खुलीं, पर वह हताश न हुआ। योग्य आदमी के लिए यश और धन की कमी नहीं, यह उसका विश्वास था। उसने कानून की परीक्षा की तैयारी शुरू की और यद्यपि उसने बहुत ज्यादा मेहनत न की, लेकिन अव्वल दरजे में पास हुआ। यशवन्त ने उसको बधाई का तार भेजा। यह अब एक जिले का अफ़सर हो गया था।
दस साल गुजर गए। यशवन्त दिलोजान से काम करता था और उसके अफसर उससे बहुत प्रसन्न थे। पर अफसर जितने प्रसन्न थे, मातहत उतने ही अप्रसन्न रहते थे। वह खुद जितनी मेहनत करता था, मातहतों से भी उतनी ही मेहनत लेना चाहता था, खुद जितना बेलौस था, मातहतों को भी उतना ही बेलौस बनाना चाहता था। ऐसे आदमी बड़े कारगुजार समझे जाते हैं। यशवन्त की कारगुजारी का अफसरों पर सिक्का जमता जाता था। पाँच वर्षों में ही वह जिले का जज बना दिया गया।
रमेश इतना भाग्यशाली न था। वह जिस इजलास में वकालत करने जाता, वहीं असफल रहता। हाकिम को नियत समय पर आने में देर हो जाती, तो खुद भी चल देता और फिर बुलाने से भी न आता। कहता-अगर हाकिम वक्त की पाबंदी नहीं करता, तो मैं क्यों करूँ? क्या गरज पड़ी है कि घंटों उनके इजलास पर खड़ा उनकी राह देखा करूँ? बहस इतनी निर्भीकता से करता कि खुशामद के आदी हुक्काम की निगाहों में उसकी निर्भीकता गुस्ताख़ी मालूम होती। सहनशीलता उसे छू नहीं गई थी। हाकिम को या दूसरे पक्ष का वकील जो उसके मुँह लगता, उसकी खबर लेता था। यहाँ तक कि एक बार वह जिला-जज ही से लड़ बैठा। फल यह हुआ कि उसकी सनद छीन ली गई। किन्तु मुवक्किल के हृदय में उसका सम्मान ज्यों-का-त्यों रहा।
तब उसने आगरा-कॉलेज में शिक्षक का पद प्राप्त कर लिया। किन्तु यहाँ भी दुर्भाग्य ने साथ न छोड़ा। प्रिंसिपल से पहले ही दिन खटपट हो गयी। प्रिंसिपल का सिद्धान्त यह था कि विद्यार्थियों को राजनीति से अलग रहना चाहिए। वह अपने कॉलेज के किसी छात्र को भी किसी राजनीतिक जलसे में शरीक न होने देते। रमेश पहले ही दिन से इस आज्ञा का खुल्लमखुल्ला विरोध करने लगा। उसका कथन था कि अगर किसी को राजनीतिक जलसों में शामिल होना चाहिए, तो विद्यार्थी को, यह भी उसकी शिक्षा का एक अंग है। अन्य देशों में छात्रों ने युगान्तर उपस्थित कर दिया है, तो इस देश में क्यों उनकी जबान बंद की जाती है? इसका फल यह हुआ कि साल खतम होने के पहले ही रमेश को इस्तीफा देना पड़ा। किन्तु विद्यार्थियों पर उसका दबाव तिल-भर भी कम न हुआ।
इस भांति कुछ तो अपने स्वभाव और कुछ परिस्थितियों ने रमेश को मार-मारकर हकीम बना दिया। पहले मुवक्किलों का पक्ष लेकर अदालत से लड़ा, फिर छात्रों का पक्ष लेकर प्रिंसिपल से रार मोल ली और अब प्रजा का पक्ष लेकर सरकार को चुनौती दी। वह स्वभाव से ही निर्भीक, आदर्शवादी, सत्यभक्त तथा आत्माभिमानी था। ऐसे प्राणी के लिए प्रजा-सेवक बनने के सिवा और उपाय ही क्या था! समाचार पत्रों में वर्तमान परिस्थिति पर उसके लेख निकलने लगे। उसकी आलोचनाएँ इतनी स्पष्ट, इतनी व्यापक और इतनी मार्मिक होती थी कि शीघ्र ही उसकी कीर्ति फैल गई। लोग मान गए कि इस क्षेत्र में एक नई शक्ति का उदय हुआ है। अधिकारी लोग उसके लेख पढ़कर तिलमिला उठते थे। उसका निशानाबा इतना ठीक बैठता था कि उससे बच निकलना असम्भव था। अतिशयोक्ति तो उनके सिरों पर से सनसनाती हुई निकल जाती थीं। उनका-वे दूर से तमाशा देख सकते थे, अभिज्ञाताओं की वे उपेक्षा कर सकते थे। ये सब शस्त्र उनके पास तक पहुँचते ही न थे, रास्ते ही में गिर पड़ते थे। पर रमेश के निशाने सिरों पर बैठते और अधिकारियों में हलचल और हाहाकार मचा देते थे।
देश की राजनीतिक स्थिति चिंताजनक हो रही थी। यशवन्त अपने पुराने मित्र के लेखों को पढ़-पढ़कर काँप उठते थे। भय होता, कहीं वह कानून के पंजे में न आ जाए। बार-बार उसे संयत रहने की ताकीद करते, बार-बार मिन्नतें करते कि जरा अपने कलम को और नरम कर दो, जान-बूझकर क्यों विषधर कानून के मुँह में उँगली डालते हो? लेकिन रमेश को नेतृत्व का नशा चढ़ा हुआ था। वह इन पत्रों का जवाब तक न देता था।
पाँचवें साल यशवन्त बदलकर आगरे का जिला-जज हो गया।
देश की राजनीतिक दशा चिन्ताजनक हो रही थी। खुफिया-पुलिस ने एक तूफान खड़ा कर दिया था। उसकी कपोल-कल्पित कथाएँ सुन-सुनकर हुक्कामों की रूह फ़ना हो रही थी। कहीं अखबारों का मुँह बंद किया जाता था, कहीं प्रजा के नेताओं का। खुफिया पुलिस ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए हुक्कामों के कुछ इस तरह कान भरे कि उन्हें हर एक स्वतन्त्र विचार रखने वाला आदमी खूनी और कातिल नजर आता था।
रमेश यह अंधेर देखकर चुप बैठने वाला मनुष्य न था। ज्यों-ज्यों अधिकारियों की निरंकुशता बढ़ती थी, त्यों-त्यों उसका भी जोश बढ़ता जाता था। रोज कहीं-न-कहीं व्याख्यान देता और उसके प्रायः सभी व्याख्यान विद्रोहात्मक भावों से भरे होते थे। स्पष्ट और खरी बातें कहना ही विद्रोह है। अगर किसी का राजनीतिक भाषण विद्रोहात्मक नहीं माना गया, तो समझ लो, उसने अपने आंतरिक भावों को गुप्त रखा है। उसके दिल में जो कुछ है, उसे जबान पर लाने का साहस उसमें नहीं है। रमेश ने मनोभावों को गुप्त रखना सीखा ही न था। प्रजा का नेता बनाकर जेल और फांसी से डरना क्या! जो आफत आनी हो, आये। वह सब कुछ सहने को तैयार बैठा था। अधिकारियों की आँखों में भी यही सबसे ज्यादा गड़ा हुआ था।
एक दिन यशवन्त ने रमेश को अपने यहाँ बुला भेजा। रमेश के जी में तो आया कि कह दे, तुम्हें आते क्या शर्म आती है! आखिर हो तो गुलाम ही! लेकिन फिर कुछ सोचकर कहला भेजा, कल शाम को आऊंगा। दूसरे दिन वह ठीक छह बजे यशवन्त के बंगले पर जा पहुँचा। उसने किसी से इसका जिक्र न किया। कुछ तो यह खयाल था कि लोग कहेंगे, मैं अफसरों की खुशामद करता हूँ और कुछ यह कि शायद इससे यशवन्त को कोई हानि पहुँचे।
वह यशवन्त के बंगले पर पहुँचा, तो चिराग जल चुके थे। यशवन्त ने आकर उसे गले से लगा लिया। आधी रात तक दोनों मित्रों में खूब बातें होती रहीं। यशवन्त ने इतने दिनों में नौकरी के जो अनुभव प्राप्त किए थे, सब बयान किए। रमेश को यह जानकर आश्चर्य हुआ, कि यशवन्त के राजनीतिक विचार कितने विषयों में मेरे विचारों से भी ज्यादा स्वतन्त्र हैं। उसका यह खयाल बिलकुल गलत निकला कि वह बिलकुल बदल गया होगा, वफादारी के राग अलापता होगा।
रमेश ने कहा- भले आदमी, जब इतना जले हुए हो, तो छोड़ क्यों नहीं देते नौकरी? और कुछ न सही, अपनी आत्मा की रक्षा तो कर सकोगे।
यशवन्त- मेरी चिन्ता पीछे करना, इस समय अपनी चिन्ता करो। मैंने तुम्हें सावधान करने को बुलाया है। इस वक्त सरकार की नजर में तुम बेतरह खटक रहे हो। मुझे भय है, कि तुम कहीं पकड़े न जाओ।
रमेश- इसके लिए तो तैयार बैठा हूँ।
यशवन्त- फिर आग में कूदने से लाभ ही क्या?
रमेश- हानि-लाभ देखना मेरा काम नहीं। मेरा काम तो अपने कर्तव्य का पालन करना है।
यशवन्त- हठी तो तुम सदा के हो, मगर मौका नाजुक है, संभले रहना ही अच्छा है। अगर मैं देखता कि जनता में वास्तविक जागृति है, तो तुमसे पहले मैदान में आता। पर जब देखता हूँ कि अपने ही मरे स्वर्ग देखना है, तो आगे कदम रखने की हिम्मत नहीं पड़ती।
दोनों दोस्तों ने देर तक बातें की। कॉलेज के दिन याद आये। सहपाठियों के लिए कॉलेज की पुरानी स्मृतियाँ मनोरंजन और हास्य का अविरल ओत हुआ करती हैं। अध्यापकों पर आलोचनाएँ हुईं, कौन-कौन साथी क्या कर रहा है, इसकी चर्चा हुई। बिलकुल यही मालूम होता था कि दोनों अभी भी कॉलेज के छात्र हैं। गम्भीरता नाम को भी न थी।
रात ज्यादा हो गई। भोजन करते-करते एक बज गया। यशवन्त ने कहा- अब कहीं जाओगे, यहीं सो रहो और बातें हों। तुम तो कभी आते भी कहीं? रमेश तो रमते जोगी थे ही, खाना खाकर बातें करते-करते सो गए। नींद खुली, तो नौ बज गए थे। यशवन्त सामने खड़े मुस्करा रहे थे।
इसी रात को आगरे में भयंकर डाका पड़ गया।
रमेश दस बजे घर पहुँचे, तो देखा, पुलिस ने उनका मकान घेर रखा है। इन्हें देखते ही एक अफसर ने वारंट दिखाया। तुरन्त घर की तलाशी होने लगी। मालूम नहीं, क्यों कर रमेश के मेज़ की दराज में से एक पिस्तौल निकल आयी। फिर क्या था, हाथों में हथकड़ी पड़ गई। अब किसे उनके डाके में शरीक होने से इनकार हो सकता था? और भी कितने ही आदमियों पर आफत आयी। सभी प्रमुख नेता चुन लिए गए मुकदमा चलने लगा।
औरों की बात तो ईश्वर जाने, पर रमेश निरपराध था। इसका उसके पास ऐसा प्रबल प्रमाण था, जिसकी सत्यता से किसी को इनकार न हो सकता था। पर क्या वह इस प्रमाण का उपयोग कर सकता था?
रमेश ने सोचा, यशवन्त स्वयं मेरे वकील द्वारा सफाई के गवाहों में अपना नाम लिखाने का प्रस्ताव करेगा। मुझे निर्दोष जानते हुए वह कभी मुझे जेल न जाने देगा। वह इतना हृदय-शून्य नहीं है। लेकिन दिन गुजरते जाते थे और यशवन्त की ओर से इस प्रकार का कोई प्रस्ताव न होता था, और रमेश खुद संकोचवश उसका नाम लिखाते हुए डरते थे। न-जाने इसमें उसे क्या बाधा हो। अपनी रक्षा के लिए वह उसे संकट में न डालना चाहते थे।
यशवन्त हृदय-शून्य न थे, भाव-शून्य न थे, लेकिन कर्म-शून्य अवश्य थे। उन्हें अपने परम मित्र को निर्दोष मारे जाते देखकर दुःख होता था, कभी-कभी रो पड़ते थे, पर इतना साहस न होता था कि सफाई देकर उसे छुड़ा लें। न जाने अफसरों को क्या खयाल हो। कहीं यह न समझने लगें कि मैं भी षड्यन्त्रकारियों से सहानुभूति रखता हूँ। मेरा भी उनके साथ कुछ सम्पर्क है। यह मेरे हिन्दुस्तानी होने का दंड है। जानकर जहर निगलना पड़ रहा है। पुलिस ने अफसरों पर इतना आतंक जमा दिया है कि चाहे मेरी शहादत से रमेश छूट भी जाए, खुल्लमखुल्ला मुझ पर अविश्वास न किया जाए, पर दिलों से यह सन्देह क्यों कर दूर होगा कि मैंने केवल एक स्वदेश-बन्धु को छुड़ाने के लिए झूठी गवाही दी? और बन्धु भी कौन? जिस पर राज विद्रोह का अभियोग है।
इसी सोच-विचार में एक महीना गुजर गया। उधर मजिस्ट्रेट ने यह मुकदमा यशवन्त ही के इजलास में भेज दिया। डाके में कई खून हो गए थे और मजिस्ट्रेट को उतनी कड़ी सजाएँ देने का अधिकार न था, जितनी उसके विचार में दी जानी चाहिए थीं।
यशवन्त अब बड़े संकट में पड़ा। उसने छुट्टी लेनी चाही, लेकिन मंजूर न हुई। सिविल सर्जन अंग्रेज था। इस वजह से उसकी सनद लेने की हिम्मत न पड़ी। बला सिर पर आ पड़ी थी और उससे बचने का उपाय न सूझता था।
भाग्य की कुटिल क्रीड़ा देखिए। साथ खेले और साथ पढ़े हुए दो मित्र एक दूसरे के सम्मुख खड़े थे, केवल एक कटघरे का अन्तर था। पर एक की जान दूसरे की मुट्ठी में थी। दोनों की आँखें कभी चार न होतीं। दोनों सिर नीचा किए रहते थे। यद्यपि यशवन्त न्याय के पद पर था और रमेश मुलजिम, लेकिन यथार्थ में दशा इसके प्रतिकूल थी। यशवन्त की आत्मा लज्जा, ग्लानि और मानसिक पीड़ा से तड़पती थी, और रमेश का मुख निर्दोषिता प्रकाश से चमकता रहता था।
दोनों मित्रों में कितना अन्तर था। एक कितना उदार था, दूसरा कितना स्वार्थी। रमेश चाहता, तो भरी अदालत में उस रात की बात कह देता। लेकिन यशवन्त जानता था, रमेश फाँसी से बचने के लिए भी उस प्रमाण का आश्रय न लेगा, जिसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ।
जब तक मुकदमे की पेशियाँ होती रहीं, तब तक यशवन्त को असह्य मर्म- वेदना होती रही। उसकी आत्मा और स्वार्थ में नित्य संग्राम होता रहता था, पर फैसले के दिन तो उसकी वही दशा हो रही थी, जो किसी खून के अपराधी की हो। इजलास पर जाने की हिम्मत न पड़ती थी। वह तीन बजे कचहरी पहुँचा। मुलजिम अपना भाग्य-निर्णय सुनने को तैयार खड़े थे। रमेश भी आज रोज से ज्यादा उदास था। उसके जीवन-संग्राम में वह अवसर आ गया था, जब उसका सिर तलवार की धार के नीचे होगा। अब तक भय सूक्ष्म रूप में था, आज उसने स्थूल रूप धारण कर लिया था।
यशवन्त ने दृढ़ स्वर में फैसला सुनाया। जब उसके मुख से ये शब्द निकले कि रमेशचन्द्र को सात वर्ष का कठोर कारावास, तो उसका गला बँध गया, उसने तजवीज मेज़ पर रख दी। कुर्सी पर बैठकर पसीना पोंछने के बहाने आंखों में उमड़े हुए आँसुओं को पोंछा इसके आगे तजवीज उससे न पड़ी गई।
रमेश जेल से निकलकर पक्का क्रान्तिकारी बन गया। जेल की अँधेरी कोठरी में दिल-भर के कठिन परिश्रम के बाद वह दीनों के उपकार और सुधार के मनसूबे बाँधा करता था। सोचा, मनुष्य क्यों पाप करता है? इसलिए न कि संसार में इतनी विषमता है। कोई तो विशाल भवनों में रहता है और किसी को पेड़ की छाँह भी मयस्सर नहीं। कोई रेशम और रत्नों से मढ़ा हुआ है, किसी को फटा वस्त्र भी नहीं। ऐसे न्याय-विहीन संसार में यदि चोरी, हत्या और अधर्म है, तो यह किसका दोष है? वह एक ऐसी समिति खोलने का स्वप्न देखा करता जिसका काम संसार से इस विषमता को मिटा देना हो।
संसार सबके लिए है और उसमें सबके सुख भोगने का समान अधिकार है। न डाका, डाका है, न चोरी, चोरी। धनी अगर अपना धन खुशी से नहीं बाँट देता, तो उसकी इच्छा के विरुद्ध बाँट लेने में क्या पाप! धनी उसे पाप कहता है, तो कहे। उनका बनाया हुआ कानून अगर दंड देना चाहता है, तो दे। हमारी अदालत भी अलग होगी। उसके सामने ये सभी मनुष्य अपराधी होंगे, जिनके पास जरूरत से ज्यादा सुख-भोग की सामग्रियाँ हैं। हम भी उन्हें दंड देंगे, हम भी उनसे कड़ी मेहनत लेंगे ।
जेल से निकलते ही उसने इस सामाजिक क्रान्ति की घोषणा कर दी। गुप्त सभा, बनने लगीं, शस्त्र जमा किए जाने लगे और थोड़े ही दिनों में डाकों का बाजार गरम हो गया। पुलिस ने उनका पता लगाना शुरू किया। उधर क्रान्तिकारियों ने पुलिस पर भी हाथ साफ करना शुरू किया। उनकी शक्ति दिन-दिन बढ़ने लगी। काम इतनी चतुराई से होता था कि किसी को अपराधियों का कुछ सुराग न मिलता।
रमेश कहीं गरीबों के लिए दवाखाने खोलता, कहीं बैंक। डाके के रुपयों से उसने इलाके खरीदना शुरू किया। जहाँ कोई इलाका नीलाम होता, वह उसे खरीद लेता। थोड़े ही दिनों में उसके अधीन एक बड़ी जायदाद हो गई। इसका नफा गरीबों के उपकार में खर्च होता था। तुर्रा यह कि सभी जानते थे, यह रमेश की करामात है, पर किसी को मुँह खोलने की हिम्मत न होती थी। सभ्य समाज की दृष्टि में रमेश से ज्यादा घृणित और कोई प्राणी संसार में न था। लोग उसका नाम सुनकर कानों पर हाथ रख लेते थे। शायद उसे प्यासे मरता देखकर कोई एक बूंद पानी भी उसके मुँह में न डालता। लेकिन किसी की मजाल न थी कि उस पर आक्षेप कर सके।
इस तरह कई साल गुजर गए। सरकार ने डाकुओं का पता लगाने के लिए बड़े-बड़े इनाम रखे। यूरोप से गुप्त पुलिस के सिद्धहस्त आदमियों को बुलाकर इस काम पर नियुक्त किया गया। लेकिन गजब के डकैत थे, जिनकी हिकमत के आगे किसी की कुछ न चलती थी।
पर रमेश खुद अपने सिद्धान्तों का पालन न कर सका। ज्यों-ज्यों दिन गुजरते थे, उसे अनुभव होता था कि मेरे अनुयायियों में असंतोष बढ़ता जाता है। उनमें भी जो ज्यादा चतुर और साहसी थे, वे दूसरों पर रोब जमाते और लुट के माल में बराबर हिस्सा न लेते थे। यहाँ तक कि रमेश से कुछ लोग जलने लगे । वह अब राजसी ठाट से रहता था। लोग कहते, उसे हमारी कमाई को यों उड़ाने का क्या अधिकार है? नतीजा यह हुआ कि आपस में फूट पड़ गई।
रात का वक्त था, काली घटा छाई थी। आज डाक गाड़ी में डाका पड़ने वाला था। प्रोग्राम पहले से तैयार कर लिया गया था। पाँच साहसी युवक इस काम के लिए चुने गए थे।
सहसा एक युवक ने खड़े होकर, कहा-बार-बार मुझे ही क्यों चुनते हैं? हिस्सा लेने वाले तो सब हैं, मैं ही क्यों बार-जार अपनी जान जोखिम में डालूं? रमेश ने दृढ़ता से कहा- इसका निश्चय करना मेरा काम है कि किसे कहाँ भेजा जाए। तुम्हारा काम केवल मेरी आज्ञा का पालन है।
युवक- अगर मुझसे काम ज्यादा लिया जाता है, तो हिस्सा क्यों नहीं ज्यादा दिया जाता?
रमेश ने उसकी त्यौरियां देखीं और चुपके से पिस्तौल हाथ में लेकर बोले- इसका फैसला वहाँ से लौटने के बाद होगा।
युवक- मैं जाने से पहले इसका फैसला करना चाहता हूँ।
रमेश ने इसका जवाब न दिया। वह पिस्तौल से उसका काम तमाम कर देना ही चाहते थे कि युवक खिड़की से नीचे कूद पड़ा और भागा। कूदने-फांदने में उसका जोड़ न था। चलती रेलगाड़ी से फाँद पड़ना उसके बाएँ हाथ का खेल था।
वह यहाँ से सीधा गुप्त पुलिस के प्रधान के पास पहुँचा।
यशवंत ने भी पेंशन लेकर वकालत शुरू की थी। न्याय-विभाग के सभी लोगों से उनकी मित्रता थी। उनकी वकालत बहुत जल्द चमक उठी। यशवंत के पास लाखों रुपये थे। उन्हें पेंशन बहुत मिलती थी। वह चाहते, तो घर बैठे आनन्द से अपनी उम्र के बाकी दिल काट देते। देश और जाति की कुछ सेवा करना भी उनके लिए मुश्किल न था। ऐसे ही पुरुषों से निःस्वार्थ सेवा की आशा की जा सकती है। पर यशवन्त ने अपनी सारी उम्र रुपये कमाने में गुजारी थी, और वह अब कोई ऐसा काम न कर सकते थे, जिसका फल रुपयों की सूरत में न मिले।
यों तो सारा सभ्य समाज रमेश से घृणा करता था, लेकिन यशवन्त सबसे बढ़ा हुआ था। कहता, अगर कभी रमेश पर मुकदमा चलेगा, तो मैं बिना फीस लिये सरकार की तरफ से पैरवी करूंगा। खुल्लमखुल्ला रमेश पर छींटे उड़ाया करता- यह आदमी नहीं शैतान है, राक्षस है, ऐसे आदमी का तो मुंह न देखना चाहिए। उफ, इसके हाथों कितने के भले घरों का सर्वनाश हो गया। कितने भले आदमियों के प्राण गये। कितनी स्त्रियाँ विधवा हो गई। कितने बालक अनाथ हो गए। आदमी नहीं पिशाच है। मेरा बस चले, इसे गोली मार दूँ जीता नुचवा दूँ।
सारे शहर में शोर मचा हुआ था-रमेश बाबू पकड़े गए! बात सच्ची थी। रमेश चुपचाप पकड़ा गया था। उसी युवक ने, जो रमेश के सामने कूदकर आगा था, पुलिस के प्रधान से सारा कच्चा चिट्ठा बयान कर दिया था। अपहरण और हत्या का कैसा रोमांचकारी, कैसा पैशाचिक, कैसा पापपूर्ण वृत्तान्त था।
भद्र समुदाय बगलें बजाता था। सेठों के घरों में घी के चिराग जलते थे। उनके सिर पर एक नंगी तलवार लटकी रहती थी, आज वह हट गई। अब वे मीठी नींद सो सकते थे।
अखबारों में रमेश के हथकंडे छपने लगे। वे बातें, जो अब तक मारे भय के किसी की जबान पर न आती थीं, अब अखबारों में छपने लगी। उनको पढ़कर पता चलता था कि रमेश ने कितना अंधेर मचा रखा था। कितने ही राजे और रईस उसे माहवार टैक्स दिया करते थे। उसका पुरजा पहुँचता, फलां तारीख को इतने रुपये भेज दो । फिर किसी की मजाल थी कि उसका हुक्म टाल सके? वह जनता के हित के लिए जो काम करता, उसके लिए भी अमीरों से चंदे लिये जाते थे। रकम लिखना रमेश का काम था। अमीर को बिना कान-पूंछ हिलाए यह रकम दे देनी पड़ती थी।
लेकिन भद्र समुदाय जितना ही प्रसन्न था, जनता उतनी ही दुखी थी। अब कौन पुलिस वालों के अत्याचार से उनकी रक्षा करेगा, कौन सेठों के जुल्म से उन्हें बचाएगा, कौन उनके लड़कों के लिए कला-कौशल के मदरसे खोलेगा? वे अब किसके बल कूदेंगे? यही उनका अवलम्ब था। वे अब किसका मुँह ताकेंगे? किसको अपनी फरियाद सुनाएँगे?
पुलिस शहादतें जमा कर रही थी। सरकारी वकील जोरों से मुकदमा चलाने की तैयारियाँ कर रहा था। लेकिन रमेश की तरफ से कोई वकील न खड़ा होता था। जिले भर में एक ही आदमी था, जो उसे कानून के पंजे से छुड़ा सकता था। वह था यशवन्त। लेकिन यशवन्त, जिसके नाम से कानों पर उँगली रखता था, क्या उसकी वकालत करने को खड़ा होगा? असम्भव।
रात के नौ बजे थे। यशवन्त के कमरे में एक स्त्री ने प्रवेश किया। यशवन्त अखबार पढ़ रहा था। बोला- क्या चाहती हो?
स्त्री- अपने पति के लिए एक वकील।
यशवन्त- तुम्हारा पति कौन है?
स्त्री- वही जो आपके साथ पढ़ता था, और जिस पर डाके का झूठा अभियोग चलाया जानेवाला है।
यशवन्त ने चौंक कर पूछा- तुम रमेश की स्त्री हो?
स्त्री- हाँ।
यशवन्त- मैं उनकी वकालत नहीं कर सकता।
स्त्री- आपको अख्तियार है। आप अपने जिले के आदमी हैं और मेरे पति के मित्र भी रह चुके हैं। इसलिए सोचा था, क्यों बाहर वालों को बुलाऊँ? मगर अब इलाहाबाद या कलकत्ते से ही किसी को बुलाऊंगी।
यशवन्त- मेहनताना दे सकोगी?
स्त्री ने अभिमान के साथ कहा- बड़े-बड़े वकील का मेहनताना क्या होता है?
यशवन्त- तीन हजार रुपये रोज।
स्त्री-बस! आप इस मुकदमे को ले लें, मैं आपको तीन हजार रुपए रोज दूंगी।
थशवन्त- तीन हजार रुपए रोज।
स्त्री- हाँ और यदि आपने उन्हें छुड़ा लिया, तो पचास हजार रुपये आपको इनाम के तौर पर और दूंगी।
यशवन्त के मुँह में पानी भर आया। अगर मुकदमा दो महीने भी चला, तो कम-से-कम एक लाख रुपए सीधे हो जाएँगे, पुरस्कार ऊपर से। पूरे दो लाख की गोटी है। इतना धन तो जिंदगी-भर में भी जमा न कर पाए थे। मगर दुनिया क्या कहेगी? अपनी आत्मा भी तो नहीं गवाही देती। ऐसे आदमी को कानून के पंजे से बचाना असंख्य प्राणियों की हत्या करना है। लेकिन गोटी दो लाख की है। कुछ रमेश के फंस जाने से इस जत्थे का अन्त तो हुआ नहीं जाता। उसके चेले-चपाटे तो रहेंगे ही। शायद वे अब और भी उपद्रव मचाएं। फिर मैं दो लाख की गोटी क्यों जाने दूँ? लेकिन मुझे कहीं मुँह दिखाने की जगह न रहेगी। न सही। जिसका जी चाहे खुश हो, जिसका जी चाहे नाराज। ये दो लाख तो नहीं छोड़े जाते। कुछ मैं किसी का गला तो दबाता नहीं, चोरी तो करता नहीं? अपराधियों की रक्षा करना तो मेरा काम ही है।
सहसा स्त्री ने पूछा- आप क्या जवाब देते हैं?
यशवन्त-मैं कल जवाब दूँगा। जरा सोच लूँ?
स्त्री- नहीं, मुझे इतनी फुरसत नहीं है। अगर आपको कुछ उलझन हो तो साफ-साफ कह दीजिए, मैं और प्रबंध करूँ?
यशवन्त को और विचार करने का अवसर न मिला। जल्दी का फैसला स्वार्थ ही की ओर झुकता है। यहाँ हानि की सम्भावना नहीं रहती।
यशवन्त- आप कुछ रुपए पेशगी दे सकती हैं?
स्त्री- रुपयों की मुझसे बार-बार चर्चा न कीजिए। उनकी जान के सामने रुपयों की हस्ती क्या है। आप जितनी रकम चाहें, मुझसे ले लें। आप चाहे उन्हें छुड़ा न सके, लेकिन सरकार के दाँत जरूर खट्टे कर दें।
यशवन्त- खैर, मैं ही वकील हो जाऊंगा। कुछ पुरानी दोस्ती का निर्वाह भी तो करना चाहिए।
पुलिस ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, सैकड़ों शहादतें पेश कीं। मुखबिर ने तो पूरी गाथा ही सुना दी, लेकिन यशवन्त ने कुछ ऐसी दलीलें की, शहादतों को कुछ इस तरह झूठा सिद्ध किया और मुखबिर की कुछ ऐसी खबर ली कि रमेश बेदाग छूट गए। उन पर कोई अपराध न सिद्ध हो सका। यशवन्त जैसे संयत और विचारशील वकील का उनके पक्ष में खड़े हो जाना ही इसका प्रमाण था कि सरकार ने गलती की।
संध्या का समय था। रमेश के द्वार पर शामियाना तना हुआ था। गरीबों को भोजन कराया जा रहा था। मित्रों की दावत हो रही थी। यह रमेश के छूटने का समय था। यशवन्त को चारों ओर से धन्यवाद मिल रहे थे। रमेश को बधाइयाँ दी जा रही थीं। यशवन्त बार-बार रमेश से बोलना चाहता, लेकिन रमेश उसकी ओर से मुंह फेर लेते थे। अब तक उन दोनों में एक बात भी न हुई थी।
आखिर यशवन्त ने एक बार झुँझलाकर कहा- तुम तो मुझसे इस तरह ऐंठे हुए हो, मानो मैंने तुम्हारे साथ कोई बुराई की है।
रमेश- और आप क्या समझते हैं कि मेरे साथ भलाई की है? पहले आपने मेरे इस लोक का सर्वनाश किया था, अब की परलोक का किया। पहले न्याय किया होता, तो मेरी जिन्दगी सुधर जाती और अब जेल जाने देते, तो आकबत बन जाती।
यशवन्त- यह तो न कहोगे कि मुझे इस मामले में कितने साहस से काम लेना पड़ा।
रमेश- आपने साहस से काम नहीं लिया, स्वार्थ से काम लिया। आप स्वार्थ के भक्त हैं। मैं तो आपको ‘भाड़े का टट्टू समझता हूँ। मैंने अपने जीवन का बहुत दुरुपयोग किया, लेकिन उसे आपके जीवन से बदलने को किसी दशा में भी तैयार नहीं हूँ। आप मुझसे धन्यवाद की आशा न रखें।
